Wednesday, January 15, 2014

खुद के लिये अज़नबी ...

कितना इंतज़ार किया 
की शायद अब
कुछ कहो तुम 
कुछ ऐसा 
जिससे ये खालीपन हटे,

खालीपन
जो शायद कभी
महसूस किया ही नहीं तुमने,
एक कमी 
जो शायद कभी
लगी ही नहीं तुम्हें,
तुम्हारी नज़रों में
शायद मेरी अहमियत ही नहीं इतनी
की तुम कभी गौर करो
की मुझमें कुछ बदला बदला सा है,

और मैं इतनी बदलती गयी 
इतनी 
की आज एक अजनबी सी हो गयी हूँ
खुद के लिये भी ||




दोराहे ...

कभी कभी जाके
उसी दोराहे पर,
जी चाहता है
तुम्हारा इंतज़ार करने को,
उसी दोराहे पर 
जहां तुम मिले थे आखिरी बार |
और फिर अलग हो गये थे हमारे रास्ते 

कुछ दिनो तक रहा इंतज़ार 
शायद मिलो तुम कहीं |
पर फिर से नहीं मिला करते
दोहरे से निकले रास्ते,
पर वापस तो जाते हैं 
वोही रास्ते 
उसी दोहरे पर |

काश तुम भी आओ वापस 
एक दिन
मेरी तरह 
उसी दोराहे पर,
और क्या पता
हम दोनों वो सब 
कह लें 
सुन लें 
वो सब
जिसके बाद दो रास्तों की जरूरत ही ना रहे,
और ना रहे जरूरत 
उस दोराहे की |




Monday, August 6, 2012

ये जिंदगी तुम्हारी शुक्रगुज़ार है... contd.


Continued From:  ये जिंदगी तुम्हारी शुक्रगुज़ार है...

तेरे  साथ  जो  बीता  था, 
हँसता  हुआ 
बेशकीमती  सा 
यूं  तो  वो  एक  अरसा  सा  था 
पर  न  जाने  क्यों  गुजर  गया 
वो  चाँद  लम्हों  सा |

अनगिनत  यादें  सिमिटी  हुई  हैं  
हर  उस  लम्हे  में 
यादें मुस्कराहटों  की 
यादें  खिलखिलाहटों  की 
यादें  शरारतों  की 
और 
यादें  शिकायतों  की  |


वो जो भी था
ये जो भी है
उसके लिए
मेरे दोस्त,
ये जिंदगी तुम्हारी शुक्रगुज़ार है ||

Wednesday, April 25, 2012

तुम रात और मैं रौशनी ...

मेरे अस्तित्व की वजह
तुम ही तो हो |
और मेरे होने का उद्देश्य भी
तुम ही हो |
फिर क्यों,
तुम्हें हटाना

तुम्हें मिटाना
मेरी जिंदगी की परिभाषा सी है |
तुम भी तो अद्भुत से ही हो,
मुझे ख़ुशी हो

अपने होने पे
इसलिए तुम सब छुपा लेते हो,
अपने अनंत विस्तार में |
तुम हो अँधेरी काली रात
और मैं,
तुमसे लड़ती हुई एक रौशनी ||