Thursday, June 23, 2011

बेनाम, अपरिभाषित से रिश्ते ....

सिखाया  है 
मेरी  हर  उम्मीद  ने,
कि  शायद  आज  भी  हैं
हम  उतने  ही  अजनबी |
और  फिर  मुझे  तो
 
हक  ही  नहीं
इन   शिकायतों  का  भी | 
मेरे  दोस्त,
तुम्हारे  मेरे   दरमियान
कुछ  भी  तो  ऐसा  नहीं
जिसका  हो  कोई  नाम , कोई  परिभाषा
 
जो  हो  दोस्ती  से  थोडा  ज्यादा |
गलती  शायद  मेरी  ही  थी,
बड़े  खोखले  से  होते  हैं
ये  बेनाम, अपरिभाषित  से  रिश्ते  ||

Monday, June 13, 2011

और हम मिलें दो अजनबियों की तरह ...

अरसा  हो  गया  है  
तुम्हें  गए, 
मन  भूलने  लगा  है 
तुम्हारी  आवाज़,
तुम्हारा   चेहरा 
लगने  लगा  है   अंजाना सा,
उतनी  नहीं  याद  आती अब


तुम्हारी  यादें , 
कोई  अहसास  नहीं  होता 
तुम्हारे  ज़िक्र  से, 
उन   शामों की  यादें
बाकी  हैं 
उन  सुबहों  की  ही  तरह
बहुत  धुंधली  सी,
वो  कमज़ोर  कड़ी
जो  बड़े  जतन  से
सम्हाली  हुई  थी


टूट  सी  रही  है, 
शायद  नहीं  रहा  अब
तुम्हारे  लौटने  का  इंतज़ार,
न  रही  परवाह
इस  बात  की
की  कल  हम  मिलें
और  मिलें  दो  अजनबियों  की  तरह ||