Thursday, June 23, 2011

बेनाम, अपरिभाषित से रिश्ते ....

सिखाया  है 
मेरी  हर  उम्मीद  ने,
कि  शायद  आज  भी  हैं
हम  उतने  ही  अजनबी |
और  फिर  मुझे  तो
 
हक  ही  नहीं
इन   शिकायतों  का  भी | 
मेरे  दोस्त,
तुम्हारे  मेरे   दरमियान
कुछ  भी  तो  ऐसा  नहीं
जिसका  हो  कोई  नाम , कोई  परिभाषा
 
जो  हो  दोस्ती  से  थोडा  ज्यादा |
गलती  शायद  मेरी  ही  थी,
बड़े  खोखले  से  होते  हैं
ये  बेनाम, अपरिभाषित  से  रिश्ते  ||

1 comment:

  1. मेरे राह्बर मुझको गुमराह कर दे |
    सुना है कि मन्जिल करीब आ गयी है ||

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