सिखाया है
मेरी हर उम्मीद ने,
कि शायद आज भी हैं
हम उतने ही अजनबी |
और फिर मुझे तो
मेरी हर उम्मीद ने,
कि शायद आज भी हैं
हम उतने ही अजनबी |
और फिर मुझे तो
हक ही नहीं
इन शिकायतों का भी |
मेरे दोस्त,
तुम्हारे मेरे दरमियान
कुछ भी तो ऐसा नहीं
जिसका हो कोई नाम , कोई परिभाषा
इन शिकायतों का भी |
मेरे दोस्त,
तुम्हारे मेरे दरमियान
कुछ भी तो ऐसा नहीं
जिसका हो कोई नाम , कोई परिभाषा
जो हो दोस्ती से थोडा ज्यादा |
गलती शायद मेरी ही थी,
बड़े खोखले से होते हैं
ये बेनाम, अपरिभाषित से रिश्ते ||
गलती शायद मेरी ही थी,
बड़े खोखले से होते हैं
ये बेनाम, अपरिभाषित से रिश्ते ||
मेरे राह्बर मुझको गुमराह कर दे |
ReplyDeleteसुना है कि मन्जिल करीब आ गयी है ||