कितना इंतज़ार किया
की शायद अब
कुछ कहो तुम
कुछ ऐसा
जिससे ये खालीपन हटे,
खालीपन
जो शायद कभी
महसूस किया ही नहीं तुमने,
एक कमी
जो शायद कभी
लगी ही नहीं तुम्हें,
तुम्हारी नज़रों में
शायद मेरी अहमियत ही नहीं इतनी
की तुम कभी गौर करो
की मुझमें कुछ बदला बदला सा है,
और मैं इतनी बदलती गयी
इतनी
की आज एक अजनबी सी हो गयी हूँ
खुद के लिये भी ||