Thursday, December 22, 2011

बादल और चाँद ...


अँधेरी स्याह रात |
बादलों का समुन्दर |
और बस अभी अभी
झाँकने सा लगा है
चाँद
उन बादलों के ऊपर से |
उसकी चांदनी


घुलती सी जा रही है
इस बहती हुई हवा में,
और रोशन कर रही है
तेरे उन वादों को
जो खो से गए थे कहीं,
उस काली अँधेरी रात में |
अरे ये क्या


तेरे वो वादे तैरने लगे हैं,
चांदनी घुली हुई हवा में |
एक घेरा सा बनता जा रहा है
मेरे चारों तरफ,
मैं बेबस खड़ी
देख रही हूँ |
अच्छी लग रही है
तेरे वादों की गर्माहट
तू मुझसे कह रहा हो जैसे


अकेली कहाँ है तू,
सब तो हैं तेरे साथ |
ये झांकता हुआ चाँद
और उसकी पिघलती हुई चांदनी
वो तैरते हुए बादल
और ये सरसराती हुई हवा
सब तो हैं तेरे साथ,
अकेली कहाँ है तू ||


******  (Inspired by a painting of  my friend, Richa Singh)    ******
****** http://archana-richa.blogspot.com/2011/12/blog-post.html  ******

1 comment: